Tuesday, 11 June 2013

आवाज हूँ मैं.....


आवाज  हूँ, सख्त हूँ, विभक्त हूँ मैं
इसीलिए तो हर वक्त हूँ हर वक्त हूँ मैं.......

छुपना मेरा काम नहीं, लुप्त होना मेरी शान नहीं
थमना मेरी आन नहीं, रूकना मेरी बान नहीं
दब जाना और दबा लेना मेरी फितरत में नहीं
क्योंकि आवाज हूँ, सख्त हूँ, विभक्त हूँ मैं
इसीलिए तो हर वक्त हूँ हर वक्त हूँ मैं..........

चुप करना और चुप हो जाना मेरा धर्म नहीं
क्योंकि हवाओं के झौंकों में, पक्षियों के कलरवों में
पशुओं की जुगाली में, फौजियों की गोली में
तोपों के शोलों में, आग के गोंलो में
माँ की लोरी में, बच्चों की किलकारी में
खेतों की क्यारी में, झरनों के जल में
समुन्द्रों के उफानों में, ज्वार औऱ भाटा में
क्योंकि आवाज हूँ, सख्त हूँ, विभक्त हूँ मैं
इसीलिए तो हर वक्त हूँ हर वक्त हूँ मैं.........

मंदिरों की आरती में, मस्जिदों की आजानों में
गुरूद्वारों की गुरवाणी में, गिरजाघरों की प्रार्थनाओं में
रेलगाडी़ की सिटी में, बैलगाडी़ के चलने में
मुजरे की घुंघरू में और मंदिरों की घन्टी में
घडी़ की टिक-टिक में, रात की तन्हाई में
क्योंकि आवाज हूँ, सख्त हूँ, विभक्त हूँ मैं
इसीलिए तो हर वक्त हूँ हर वक्त हूँ मैं...........

चलते हुए श्वांसों में, धड़कते हुए दिलों में
दुनिया के हर ताने-बाने में, गाने और बजानें में
सुर और संगीत में, गीत और मीत में
हर मंत्र में भी मैं हूँ, कवि की कविता मे भी मैं हूँ
गुरू के ज्ञान में, विधि और विधान में
सुनने में भी मैं हूँ और सुनाने में भी मैं हूँ
क्योंकि आवाज हूँ, सख्त हूँ, विभक्त हूँ मैं
इसीलिए तो हर वक्त हूँ हर वक्त हूँ मैं...........

बादलों के गरजने में, बिजलियों के चमकनें में
तुफानों के चलने में, बाढ़ के प्रकोपों में
भूकम्प के झटकों में, चक्रवाती हवाओं में
जीन्दगी की भागदौड़ में, श्मशान की खामोशियों में
अजर-अमर-अविनाशी हूँ, कभी ना खत्म होने वाला शक्स हूँ मैं

क्योंकि आवाज हूँ, सख्त हूँ, विभक्त हूँ मैं

इसीलिए तो हर वक्त हूँ हर वक्त हूँ मैं.........

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